धम्म भूमि व सेवा स्तंब ने मनाया माता रमाबाई अंबेडकर का जन्मोत्सव समारोह

 धम्मभूमि व सेवा स्तम्ब ने  मनाया माता रमाबाई अम्बेडकर का जन्मोत्सव -------------              धम्मभूमि श्रेष्ठ जीवन के लिए आंदोलन...और सेवा स्तंब की जिला इकाई की ओर से डॉ बीआर अम्बेडकर पार्क एवं लाइब्रेरी में माता रमाबाई अम्बेडकर का जन्मोत्सव समारोह जिला प्रधान भगतसिंह सांभरिया की अध्यक्षता में मनाया गया ।जिला प्रधान ने अपने वक्तव्य में बताया कि 

माता रमाबाई अम्बेडकर , भारतरत्न डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की पत्नी हमेशा डॉ बी .आर. अंबेडकर को उच्च अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करती थी और समर्थन करती थी ।डॉ.  भीमराव अंबेडकर की सफलता में  उनकी महान पत्नी रमाबाई अम्बेडकर का अतुल्य योगदान था। वह बुद्धिमान, दयालु, ममतामयी, आज्ञाकारी,  धार्मिक, उच्च चरित्र वाली , सादगी औऱ त्याग ,सम्पर्ण  ,व  शांत स्वभाव की नारी  थी।  रमाबाई का जन्म 7 फरवरी 1897. में  हुआ । महासचिव आर. पी.सिंह दहिया ने बताया कि रमाबाई  अंबेडकर शादी के समय अनपढ़ थी, लेकिन उनके पति ने बाद में यहां साधारण पढ़ना-लिखना सिखाया । शिक्षा में दोनों में अंतर की दुनिया थी ,लेकिन उन्होंने एक दूसरे को दिल के मूल से प्यार और सम्मान दिया । प्यार, विश्वास, ईमानदारी, त्याग और समझदारी संबंध , शिक्षा से अलग होने के बावजूद खुशी से जीने के लिए अटूट श्रृंखला बनाई ,अतः ये कहना कोई अतिशयोक्ति नही होगी कि बाबा साहेब की सफलता के पीछे रामबाई का बहुत बड़ा योगदान था।भीम अपनी पत्नी को स्नेह से ′′ रामू ′′ कहते थे और वो उन्हें ′′ साहिब ′′ कहती थी "।  डॉ अम्बेडकर लंदन डॉक्टरेट ऑफ साइंस, दर्शनशास्त्र और बॉन विश्वविद्यालय के अध्ययन में अमेरिकी डॉक्टरेट द्वारा प्रबलित बैरिस्टर बन गए, जो उनकी पत्नी के अपार बलिदान को प्रतिबिंबित करता था ।महिला विंग की अध्यक्ष मोनिका मेहरा ने बताया कि आंबेडकर जब उच्च अध्ययन के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे, तब पड़ोसी महिलाओं ने रमाबाई को अपने पति को विदेश जाने से रोकने की सलाह दी, और कहा कि वे किसी मेम  से शादी कर सकते हैं और उन्हें छोड़ सकते हैं । लेकिन रमाबाई को अपने साहिब पर भरोसा  था और उन महिलाओं को जवाब दिया कि ' वह अपने पति को अच्छी तरह से जानती थी और वह ऐसा नहीं कर सकते"। व. उपाध्यक्ष सूबे सिंह रेवाड़िया ने अपने वक्तव्य में बताया कि इस आदर्श दंपति  को चार पुत्रों और एक पुत्री की प्राप्ति हुई।डॉ अम्बेडकर रमाबाई को बिठल जी महाराज की यात्रा के लिए पंढरपुर ले गए, जिन पर उन्हें बहुत विश्वास था । लेकिन अछूत होने के नाते उन्हें मंदिर के पास नहीं जाने दिया गया, इसलिए उन्हें प्रार्थना करने के लिए मंदिर मूर्ति से कुछ दूरी पर खड़ा होना पड़ा । इस घटना ने स्वाभिमानी डॉ अम्बेडकर को चिड़चिड़ा  कर दिया और उन्होंने कहा ′′ वो पंढेरपुर क्या जो अपने भक्तों को भगवान की छवि देखने से रोकता है, हमारे ही पुण्य जीवन, निस्वार्थ सेवा और नीच मानवता के कारण बेदाग बलिदान से, हम  एक और पंढरपुर पैदा करेंगे ! अन्ततः 14 अक्टूबर 1956 को बाबा साहेब ने हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अपना लिया और बुद्ध को अपनी मातृभूमि में पुनः स्थापित कर अपना वचन निभाया । आखिरकार बीमारी ने रमा बाई अम्बेडकर की कमजोर काया को जकड़ लिया  । उन्हें बाबा साहेब द्वारा धारवाड़ भी ले जाया गया । लेकिन कोई भी उनके स्वास्थ्य में सुधार लाने में मदद नहीं कर पाया । कोई दवा उसे राहत नहीं दे सकी और अंत में दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित हुई और उनके निवास स्थान पर ही उनका निधन हो गया ।

इस प्रकार मन की महानता और हृदय की शुद्धता का अंत हुआ । लगभग 10,000 लोग अमीर और गरीब, शिक्षित और अनपढ़, महत्वपूर्ण और आम यहाँ अंतिम संस्कार में शामिल हुए । इस महान विभूति की जयंती पर कोटि-2 नमन । आज के इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रधान भगत सिंह सांभरिया ,महासचिव आर पी .सिंह दहिया , धनपत सिंह गिरदावर, 




, महिला विंग की अध्यक्षा मोनिका मेहरा , प्राचार्य राजकुमार जलवा,वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूबे सिंह रेवाड़िया, लक्ष्मीबाई लिसाना,भूप सिंह भारती,रजनी आजाद,डॉ मंगत सिंह,प्यारेलाल चवन, बिरदीचंद गोठवाल,सुमेर सिंह गोठवाल,विरेन्द्र सागर, राम सिंह आफ़रिया,देवेंद्र रेवाड़िया आदि उपस्थित रहे ।

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